दोस्तों आज इस लेख से हम जानेंगे कि सतत पोषणीय विकास क्या है, जानेंगे कि यह किस प्रकार से समाज अर्थव्यवस्था और पर्यावरण में सामंजस्य स्थापित करता है। इस लेख में हम सतत पोषणीय विकास की संकल्पना, महत्व, उद्देश्य तक के साथ-साथ इसे प्राप्त करने की अवधारणा को भी जानेंगे। तो चलिए जानते हैं कि सतत पोषणीय विकास क्या है?
सतत पोषणीय विकास क्या है, Satat Poshniya Vikas kya hai
सतत पोषणीय विकास, हमारे समाज , पर्यावरण तथा अर्थव्यवस्था का एक संतुलित एकीकरण है। सतत विकास तभी सफल हो सकता है जब यह आने वाली पीढ़ियों, व्यापक संभावित क्षेत्रों तथा देशों को लाभ पहुँचाता है। अतः हम कह सकते हैं कि सतत विकास का निर्णय करते समय हमें समाज, अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण पर इसके प्रभावों का विचार पूर्ववत ही कर लेना चाहिए। हमे अपने निर्णयों को भविष्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
सतत विकास, वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को क्षमता समझौता किए बिना पूरा करता है। उपरोक्त तथ्य दो रूपों में महत्वपूर्ण है। पहला, प्राकृतिक संसाधन ना केवल हमारे जीविकोपार्जन के लिए उपयोगी है बल्कि भविष्य की भावी पीढ़ियों के लिए भी यह उतना ही उपयोगी है। दूसरा, आज हम जो भी विकास संबंधी कार्य करते हैं हमें उसके परिणाम को भविष्य के लिए ध्यान में रखकर करना चाहिए।
सतत पोषणीय विकास की संकल्पना
सतत पोषणीय विकास की संकल्पना का वास्तविक विकास 1987 में प्रकाशित Our Common Future नामक रिपोर्ट जिसे द ब्रांटलैंड रिपोर्ट भी कहा जाता है के आने के पश्चात हुआ। गठित आयोग के विकास के लिए परिवर्तन हेतु वैश्विक प्रारूप का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र द्वारा रखा गया। इस रिपोर्ट ने हमारे रहन-सहन और शासन में पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया।
सतत पोषणीय विकास के प्रमुख उद्देश्य
सतत पोषणीय विकास में अभी तक तो यह स्पष्ट हो चुका है कि सतत विकास प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व के लिए एक बुनियादी शर्त है। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य पृथ्वी पर तभी तक है जब तक पेड़ पौधे या अन्य जीव जंतु। इस आधार पर सतत पोषणीय विकास के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) सतत पोषणीय विकास के उद्देश्य में प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित संसाधनों का संरक्षण करना शामिल है।
(2) मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का सीमित एवं नियोजित विदोहन करना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है।
(3) इसके प्रमुख उद्देश्यों में पर्यावरण अनुकूल मानव गतिविधियां भी शामिल है।
(4) इसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उत्पादन के अवसरों का विकास करना भी जरूरी है।
(5) निरंतर आजीविका के साथ गरीबी दूर करना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है।
सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए प्रमुख रणनीतियां
(1) सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले आत्मनिर्भर होना पड़ेगा।
(2) सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए हमें समय के साथ निरंतर बदलते रहना पड़ेगा।
(3) सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करने के लिए हमें पारिस्थितिकी का न केवल संरक्षण करना चाहिए अभी तो इसका संवर्धन भी करना चाहिए।
(4) जनसंख्या वृद्धि आज के समय में बहुत ही तेजी से बढ़ रही है। अगर हमें सतत पोषणीय विकास को प्राप्त करना है तो हमें सबसे पहले जनसंख्या पर नियंत्रण लगाना होगा। हमें जनसंख्या वृद्धि को कम करना होगा।
(5) घरेलू ईंधनों में हमें पुरानी तकनीकी जिसमे लकड़ी, चूल्हे आदि को खत्म करके नई तरीके से lpg आदि का प्रयोग करना होगा।
(6) हमें ऐसी तकनीको का आविष्कार करना होगा जिससे पर्यावरण को हानि कम से कम हो। तभी हम सतत पोषणीय विकास को प्राप्त कर सकते हैं।
सतत पोषणीय विकास के प्रमुख महत्व
(1) सतत पोषणीय विकास में प्रभावी सेटिंग तकनीकी और फसल रोटेशन जैसे टिकाऊ तकनीकी का प्रयोग करके मिट्टी की उर्वरता को बनाये रखा जा सकता हैजिससे उच्च पैदावार को भी बढ़ावा मिलता है। जो काफी बड़ी आबादी को कवर करता है।
(2) जलवायु परिवर्तन को भी कम करने में सतत विकासपद्धतियों का महत्वपूर्ण योगदान है।
(3) जो विकासशील देश जीवाश्म ईंधन का प्रयोग नही कर सकते वो नवीकरणीय संसाधनों के द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बना सकते हैं।
(4) मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति सतत विकास के द्वारा सम्भव है।
सतत पोषणीय विकास के उदाहरण
सतत पोषणीय विकास के प्रमुख उदाहरणों में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा शामिल हैं। सौर ऊर्जा पूरी तरह से स्वतंत्र और असीमित मात्रा में उपलब्ध है। और यह प्रदूषण कम करने में भी सहायक है। तथा पवन ऊर्जा ऐसा स्रोत है जो आसानी से उपलब्ध है। पवन चक्की के माध्यम से पवन ऊर्जा का उपयोग होता है।
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3 टिप्पणियाँ
Nairok gupta
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